ज्वार - भाटा क्या हैं / Oceanic Tide 🌊

Sharvan Patel
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ज्वार-भाटा (Tides): उत्पत्ति, प्रकार, अंतराल एवं देरी के कारण

समुद्र के जल स्तर में नियमित रूप से होने वाला उतार-चढ़ाव ज्वार-भाटा कहलाता है। जब समुद्र का जल स्तर ऊपर उठता है तो उसे ज्वार और जब जल स्तर नीचे गिरता है तो उसे भाटा कहा जाता है। यह एक प्राकृतिक एवं खगोलीय प्रक्रिया है, जिसका प्रभाव समुद्री तटों, बंदरगाहों, मत्स्य उद्योग और समुद्री यातायात पर गहराई से पड़ता है।

ज्वार-भाटा पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य के पारस्परिक गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उत्पन्न होता है।

ज्वार-भाटा की उत्पत्ति के कारण

ज्वार-भाटा की उत्पत्ति मुख्यतः तीन कारणों से होती है — चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल, सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल तथा पृथ्वी का घूर्णन। इनमें चंद्रमा की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि वह पृथ्वी के अधिक निकट स्थित है।

चंद्रमा पृथ्वी के जिस भाग के निकट होता है, वहाँ समुद्री जल उसकी ओर आकर्षित होकर उभार बना लेता है, जिसे ज्वार कहते हैं। इसके ठीक विपरीत भाग में भी एक ज्वार उत्पन्न होता है, जिसका कारण अपकेंद्रीय बल (Centrifugal Force) होता है।

चंद्रमा का प्रभाव सूर्य की अपेक्षा कितना अधिक होता है?

ज्वार-भाटा उत्पन्न करने में चंद्रमा का प्रभाव सूर्य की अपेक्षा लगभग 2 से 2.2 गुना अधिक होता है। हालाँकि सूर्य का द्रव्यमान चंद्रमा से बहुत अधिक है, फिर भी ज्वारीय प्रभाव के मामले में चंद्रमा की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है।

ज्वार-भाटा उत्पन्न करने में चंद्रमा का योगदान लगभग 68% तथा सूर्य का योगदान लगभग 32% होता है।

अधिक प्रभाव होने के कारण

ज्वारीय बल दूरी पर अत्यधिक निर्भर करता है। ज्वारीय बल का नियम इस प्रकार व्यक्त किया जाता है:

ज्वारीय बल ∝ द्रव्यमान / दूरी3

चंद्रमा पृथ्वी के बहुत निकट स्थित है (लगभग 3.84 लाख किलोमीटर), जबकि सूर्य पृथ्वी से लगभग 15 करोड़ किलोमीटर दूर स्थित है। दूरी के घन (distance³) के कारण सूर्य का ज्वारीय प्रभाव अत्यधिक कम हो जाता है, इसीलिए चंद्रमा का प्रभाव अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

चंद्रमा का प्रभाव सूर्य की अपेक्षा अधिक होता है, क्योंकि गुरुत्वाकर्षण बल दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

सूर्य भी ज्वार-भाटा को प्रभावित करता है, परंतु उसकी दूरी अधिक होने के कारण उसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम होता है। जब सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीधी रेखा में होते हैं, तब विशेष प्रकार के ज्वार उत्पन्न होते हैं।

ज्वार-भाटा के प्रकार

1. स्प्रिंग ज्वार (Spring Tide)

जब अमावस्या और पूर्णिमा के समय सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में होते हैं, तब सूर्य और चंद्रमा का संयुक्त गुरुत्वाकर्षण बल समुद्री जल पर अधिक प्रभाव डालता है। इससे अत्यधिक ऊँचा ज्वार तथा अत्यधिक नीचा भाटा उत्पन्न होता है, जिसे स्प्रिंग ज्वार कहा जाता है।

2. निप ज्वार (Neap Tide)

जब चंद्रमा प्रथम अथवा अंतिम तिमाही में होता है और सूर्य-पृथ्वी-चंद्रमा समकोण बनाते हैं, तब दोनों के गुरुत्वाकर्षण बल एक-दूसरे को आंशिक रूप से निष्क्रिय कर देते हैं। परिणामस्वरूप कम ऊँचाई का ज्वार उत्पन्न होता है, जिसे निप ज्वार कहते हैं।

3. दैनिक ज्वार (Diurnal Tide)

इस प्रकार के ज्वार में एक दिन में केवल एक बार ज्वार और एक बार भाटा आता है। यह ज्वार मुख्यतः मेक्सिको की खाड़ी जैसे क्षेत्रों में पाया जाता है।

4. अर्ध-दैनिक ज्वार (Semi-Diurnal Tide)

इसमें एक दिन में दो बार समान ऊँचाई के ज्वार और दो बार समान भाटा आते हैं। विश्व के अधिकांश तटीय क्षेत्रों में यही ज्वार पाया जाता है।

5. मिश्रित ज्वार (Mixed Tide)

मिश्रित ज्वार में एक दिन में दो बार ज्वार और भाटा आते हैं, परंतु उनकी ऊँचाई समान नहीं होती। भारत के कुछ तटीय भागों में यह ज्वार देखा जाता है।

ज्वार-भाटा का अंतराल (Tidal Interval)

दो क्रमिक ज्वारों या दो क्रमिक भाटों के बीच के समय को ज्वार-भाटा का अंतराल कहा जाता है। पृथ्वी पर प्रत्येक स्थान पर प्रतिदिन 12 घंटे 26 मिनट के बाद ज्वार तथा ज्वार के 6 घंटा 13 मिनट बाद भाटा आता है।

यह अतिरिक्त 26 मिनट चंद्रमा की पृथ्वी के चारों ओर गति के कारण होते हैं।

पृथ्वी को पुनः उसी स्थिति में आने के लिए अतिरिक्त समय लगता है, ताकि चंद्रमा के सामने पुनः ज्वार उत्पन्न हो सके। इसी कारण प्रतिदिन ज्वार-भाटा का समय थोड़ा-सा आगे बढ़ जाता है।

पृथ्वी पर दो ज्वार-भाटा के बीच कुल समय 24 घंटे 52 मिनट क्यों होता है?

पृथ्वी पर किसी भी स्थान पर लगातार आने वाले दो समान ज्वारों (या दो समान भाटों) के बीच का कुल समय लगभग 24 घंटे 52 मिनट होता है। इसका मुख्य कारण यह है कि चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर निरंतर अपनी कक्षा में आगे बढ़ता रहता है

यदि चंद्रमा स्थिर होता, तो यह समय ठीक 24 घंटे होता, परंतु चंद्रमा की कक्षीय गति के कारण इसमें अतिरिक्त समय जुड़ जाता है।

चंद्रमा की कक्षीय गति का प्रभाव

चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा लगभग 27.3 दिनों में पूरी करता है। इसका अर्थ है कि वह प्रतिदिन पृथ्वी के सापेक्ष अपनी स्थिति बदल लेता है।

जब पृथ्वी एक बार 24 घंटे में अपने अक्ष पर घूम जाती है, तब तक चंद्रमा अपनी कक्षा में आगे बढ़ चुका होता है। पृथ्वी को पुनः उसी स्थिति में आने के लिए थोड़ा और घूमना पड़ता है, जिससे ज्वार आने में देरी होती है।

गणितीय गणना (Mathematical Explanation)

अब इसे गणितीय रूप से समझते हैं:
चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा = 27.3 दिन
एक दिन में चंद्रमा की कोणीय गति = 360° ÷ 27.3
अतः,

360° ÷ 27.3 ≈ 13.2° प्रति दिन

अर्थात चंद्रमा प्रतिदिन पृथ्वी के सापेक्ष लगभग 13.2° आगे बढ़ जाता है। अब पृथ्वी को इस अतिरिक्त 13.2° घूमने में लगने वाला समय निकालते हैं।

अतिरिक्त समय की गणना

पृथ्वी 360° घूमने में 24 घंटे लेती है। 360° = 24 घंटे
1° = 24/360 घंटे
1° = 4 मिनट

अब 13.2° के लिए:

13.2 × 4 मिनट = 52.8 मिनट ≈ 52 मिनट
इस प्रकार पृथ्वी को चंद्रमा के सामने पुनः आने के लिए लगभग 52 मिनट अतिरिक्त घूमना पड़ता है।

ज्वार-भाटा का भौगोलिक एवं आर्थिक महत्व

क्षेत्र महत्व
बंदरगाह जहाजों के आवागमन में सहायता
मत्स्य उद्योग मछलियों की उपलब्धता में वृद्धि
ऊर्जा ज्वारीय ऊर्जा का उत्पादन
तटीय कृषि उपजाऊ अवसादों का जमाव

ज्वार-भाटा से उत्पन्न ज्वारीय ऊर्जा एक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है, जिसका उपयोग कई देशों में विद्युत उत्पादन हेतु किया जा रहा है।

परियोजना देश स्थापना वर्ष क्षमता (MW) प्रकार
Sihwa Lake Tidal Power Station दक्षिण कोरिया 2011 254 Tidal Barrage
La Rance Tidal Power Station फ्रांस 1966 240 Tidal Barrage
MeyGen Project स्कॉटलैंड (UK) 2016 ~6 (Phase-1) Tidal Stream
Jiangxia Tidal Power Station चीन 1980 4.1 Tidal Barrage
Uldolmok Tidal Power Station दक्षिण कोरिया 2009 1.5 Tidal Stream
  • तापीय ऊर्जा (कोयला, गैस, तेल): ~60%
  • जलविद्युत: ~15–16%
  • पवन ऊर्जा: ~8%
  • सौर ऊर्जा: ~6–7%
  • परमाणु ऊर्जा: ~9–10%
  • ज्वारीय ऊर्जा: 0.01% से भी कम

यद्यपि ज्वारीय ऊर्जा का वर्तमान योगदान बहुत कम है, फिर भी यह एक स्वच्छ, पूर्वानुमेय और दीर्घकालिक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत है। तकनीकी विकास और लागत में कमी आने पर भविष्य में इसका योगदान बढ़ सकता है।

ज्वार-भाटा केवल प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि मानव जीवन और अर्थव्यवस्था से गहराई से जुड़ा विषय है।

निष्कर्ष

ज्वार-भाटा पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण बलों का प्रत्यक्ष परिणाम है। इसके प्रकार, अंतराल और समय में होने वाली देरी को समझना भूगोल के साथ-साथ समुद्री विज्ञान और पर्यावरण अध्ययन के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह न केवल प्राकृतिक संतुलन बनाए रखता है, बल्कि मानव सभ्यता के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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